Saturday, July 28, 2012

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मैं लिखना चाहता हूँ 
एक कविता 
कि समेट लूं सारा दर्द
और उनके साये में बसी तुम्हारी ज़िन्दगी ;
फिर जब मैं आऊं तुम्हारे पास,
तो समेट लो तुम
मुझे अपने आँचल में |

मैं भुला देना चाहता हूँ 
तुम्हारे सारे दुःख, 
सारे दुस्वप्न, 
जिन्होंने 
रोक रखा है तुम्हें 
देखने से,
इस हसीन मौसम के नज़ारे |

मैं तुम्हें उठा के वहाँ से 
जहाँ हो तुम, 
बिठा देना चाहता हूँ वहाँ,
जहाँ से दिखती है 
तुम्हारी खिलखिलाती हंसी |

मैं चाहता हूँ ये ,
मैं चाहता हूँ वो ,
रोज़-ओ-शब-ओ-शाम-ओ-सहर,
हर पल, निश्चल ;

पर जाने कौन है , 
जो हमारे चाहने के बावजूद 
मटिया-मेट कर जाता है सब कुछ ;
और मैं सोचता रह जाता हूँ
कि चाहने से आखिर क्या होता है ?

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