Friday, September 18, 2009

प्यार और लड़कियाँ

वे हाथ में हाथ डालकर 
घूमा करती हैं 
सिनेमा और पार्क 
मानो मिल रहे हों 
चुम्बकों के दो विपरीत ध्रुव 

मिलते ही एकांत 
घंटों बतियाती हैं मोबाइल पर 
गज़लें,गुलाब 
कॉलेज,किताब 
मौसम,हवा 
बादल,घटा
वफाई,बेवफाई 
और गढे मुर्दों की खुदाई 

उन्हें आती हैं सैकडों दलीलें 
शैम्पू से लेकर इकॉनोमी तक 
ये जहान छोटा हो जाता है 
प्यार करने वाली लड़कियों के आगे 

उनकी बातों में 
लहराता है आत्म-विश्वास 
और आँखों से छलकता है 
युद्ध-विजय का भाव 

प्यार करने वाली लड़कियां 
प्रेम में हो जाती हैं सतर्क 
और वार्तालाप के उपरांत 
नंबर कर देती हैं 'डिलीट'

वे लड़कियाँ जिन्हें प्यार करना नहीं आता 
गाँव और कस्बों की होती हैं 
वे प्रेम में पड़कर 
खो देती हैं वाचालता 
और ओढ़ लेती हैं शर्म का साया 
वे भूल जाती हैं 
रोटियों को गोल-मटोल बेलना 
और दाल में नमक 
चाय में चीनी डालना 

उन्हें नहीं आता बतियाना 
प्यार सुनने पर 
हो जाती हैं लाल 
और छू लेने पर 
शर्म से दोहरी 

वे होती हैं 
माता,पिता की आज्ञाकारिणी 
और रखती हैं 
सोलह सोमवार का व्रत 

प्यार न करने वाली लड़कियाँ 
एकांत मिलते ही 
ताका करती हैं आसमान 
घंटों तक टुकुर-टुकुर 
शायद 
किसी फ़रिश्ते की आस में 
जिसका उद्भव होगा 
किसी जगमगाते सितारे की तरह 
और निर्लिप्त होकर 
शून्य से गुजरते हुए ले जायेगा 
सुदूर आसमान में 
विचरते बादलों की प्राचीर के पार
एक शुभ्र,धवल जहान में 

Sunday, September 13, 2009

एक पाती

कलमों की नोंकें टेढ़ी हो जाती हैं
आपके व्यवहार की शिष्टता लिखते हुए
और जुबान 
तालू से चिपक जाती है
आपके सिद्धांतों की परिपुष्टता के आगे
इसलिए कभी साहस नहीं जुटा पाता
आपका गुणगान करने का

पर आज मेरे हाथ फड़फड़ा रहे हैं
और मस्तिष्क उद्वेलित हो उठा है
अब आपका महिमा मंडन किये बिना
नियंत्रण नहीं होता

मेरे भी चक्षु गवाह हैं
कि सत्ता आदमी को
हैवान बना देती है
पर इतना भी नहीं
कि जिन्हें तुम अपना(?) कहते हो
उन्हीं को महसूस न करो

आपको कभी विचार आया
जब इस देश का
एक अदना सा आदमी
माथे पर निराशा,कुंठा की बूँदें समेटे
और सर पर श्रम और आशा की गठरी उठाये
जब इन कंगूरों और अट्टालिकाओं वाले स्मारकों से गुजरेगा
तो क्या उसका सर श्रद्धा से नतमस्तक होगा?
क्या आप महसूस करती हैं
कि रंगबिरंगी रोशनी से गुजरते हुए
वह मन में दोहराएगा
"बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मं शरणम् गच्छामि"

जीवन के विशेष दिवसों के भव्य आयोजनों
और स्मारकों,उद्यानों के निर्माण के समय
कभी आपके जेहन में उन गंगूरामों की याद भी आ जाया करे
जिनके अभाव कर रहे हैं उनकी हत्याएँ
या उस सुधा की
जो अपनी दीदी की शादी की फ़िक्र में
इतनी बड़ी हो गयी है
कि खुद शादी लायक हो गयी है
कभी आपकी करोड़ों,अरबों की योजनाओं का
एक तुच्छ हिस्सा उन्हें भी मिले

आपने अनादर किया है
अपने प्रदेश की उस ज़मीन का
जहाँ बुद्ध ने शिक्षासूत्र पिरोये
और उन अम्बेडकर का
जो जीवनपर्यंत मूर्तिपूजा के विरोध में रहे
अब उनकी मूर्तियाँ बनाकर
आप उन्हीं 
के सिद्धांतों की अवमानना करती हैं

काश आप कभी समझें
कि श्रद्धा
ऊँचे-ऊँचे मेहराबों वाले घेरों
और आदमकद मूर्तियों में नहीं उपजती
और ना ही छायादार उद्यानों में
ठहरा करती है

पहले उनके सिर से वो गठरी उतारो
जो सदियों से रखी है
और चेहरे के वे जख्म भर दो
जो बिन मांगे की पहचान बन गए हैं
फिर थमा देना मूर्तियाँ
और दिखा देना
उद्यानों की रंगीनियाँ

(दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की राजनीति को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले और सबसे बड़े प्रदेश की माननीया मुख्यमंत्री के नाम)

Friday, September 11, 2009

अभिलाषा

वे भुलाती हुई
हमारी सारी वेदनाएँ और सुख
समय और उम्र
जन्म ले लेती हैं
जटिल से जटिल परिस्थितियों में

उनके आश्रय में हम
लहरों की अंगडाई सुला देते हैं
आकाश की ऊँचाई मिटा देते हैं
आँधियों में दीप जलाने लगते हैं
पत्थर की छाती पर नव-अंकुर उगाने लगते हैं
वे उडाकर हमारी नींदें
चाहती हैं नियति का सर कलम करना

ऐसी ही होती हैं अभिलाषाएँ
छोटी,बड़ी,स्वान्तःसुखाय या परिजनहिताय

जैसे मेरी अभिलाषा कहती है कि
जब मैं नव-सृष्टि के सृजन को आगे बढूँ
तो तुम आओ मेरे साथ
और जब शिथिलता मेरे बदन पर आकर बंधक बनाने का करे प्रयास
तो तुम मुझे प्रेरित करती
अपने हाथों से पिलाओ...ओक भर पानी

Thursday, September 10, 2009

रात्रि बेला की ख्वाहिशें

गली-गली बने शिवालयों में
नीरव खामोशी
घुप्प अंधकार
और धुंधले चित्रों की क्रमहीन श्रंखला

मेरे प्यारे बनारस की धरती पर
मैं भरा हूँ
तुम्हारी दुनिया में
तुम्हारे आभामंडल की दुनिया
अंतहीन जैसे समय
चमकीली जैसे तारे

तुम्हारे बारे में सोचना
जैसे निहारना
दुग्ध-धवल झीनी चादर से
सुदूर आसमान
या सुनना
भादों के किसी बरसाती दिन
बूंदों का टिपटिपाना
या पढ़ना दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता

तुम्हारा ख्याल
जैसे
अवरोहों को ठुकराती
पीत पुष्प पल्लवित नदी
या एक ज्योति
जो काल-कवलित शलभों को
कर देती है आलौकिक

मिट जाती है
बदन पर पुती हुई कालिख
और लज्जित मस्तक
हो जाता है निष्कलंक
जो नसीब हो तेरा स्पर्श
सारा विश्व बन जाता है गौड़
जो मिले तेरे आँचल में सोने का सुख

पतझड़ की किसी रात में
जो असमय जाग उठूँ
कोई भुतहा सपना देखकर
तो झकझोरता है मेरा अवचेतन
मुझे तोड़ देने चाहिए
लोहे के सींखचे
और गिरा देनी चाहिए
कंक्रीट की दीवारें
अपनी स्वतंत्रता के लिए

माँ ....

वे कौन लोग है??
जो हमें कैद कर गए हैं
खुली हवाओं में

हमारी दुनिया बहुत भिन्न है

सृजन का सौंदर्य हो
या धर्म की पराकाष्ठा  
न्याय,संस्कृति,साधन  
बल,बुद्धि और धन    
साथ में  
भक्ति,ढोंग,पाखण्ड  
क्रोध,शोक,रोग  
वासना और निर्लज्जता  
सब कुछ तुम्हारे साए में रहते हैं  
हमारे पास है केवल  
पसीने और कीचड़ की दुर्गन्ध  

हमारे शब्द सीमित हैं  
और शब्दों के मायने भी  
हमारी भुजाएँ 
पहाड़ काटने वाली शक्ति पाकर  
बँधी रहती हैं 
और हमें नहीं सिखाया जाता  
इच्छाएँ करना  
बल्कि हम स्वतः ही सीख जाते हैं  
इच्छाओं और अभिलाषाओं का दमन करना  

हमारे सपनों को खा जाते हैं  
युग्मों में उड़कर आने वाले  
बड़ी चोंचों वाले गिद्ध  
और यदि बच भी जाएँ  
तो पड़े-पड़े हो जाते हैं जंग-ग्रस्त  

तुम्हारी और मेरी दुनिया  
इतनी भिन्न है कि 
हम अलग-अलग प्रजातियों का  
प्रतिनिधित्व करते हैं  

तुम्हारी दुनिया चमचमाती है  
कारों में दौड़ती है  
और समय से पहले बालिग़ हो जाती है  
तुम्हारी दुनिया में  
देशी,विदेशी संगीत की लहरियाँ हैं  
मैकडोनाल्ड से लेकर  
इन्टरनेट तक का  
खुशहाल संसार है  
तुम्हारी दुनिया को 
एकरसता से मोहभंग भी हो जाता है  
इसलिए  
गगनचुम्बी इमारतें बनाती है  
करोड़ों के जुए खेलती है  
और कभी-कभी  
क्लबों में फूहड़ता से नाचने भी लगती है  

हमारी दुनिया  
बरगद के ठूंठ किनारे बने  
मटमैले छप्परों में जन्म लेती है  
गँदले नालों में पलती है 
और बिना बोर्नवीटा खाए वृद्ध हो जाती है  
समय से पहले  
हमारी दुनिया  
कारखाने सिर पर उठाकर चलती है  
चैत की गर्म दुपहरी में जीती है  
कोयलों में पलती है  
और गुमनाम होकर वहीं दफ़न हो जाती है  

हमारे बदन में भरी हुई है  
असहनीय दुर्गन्ध  
और हमारे चेहरे पर हैं  
कीचड़ के धब्बे  
जिन्हें तुम हिकारत भरी नज़रों से देखा करते हो  

हमारी दुनिया है  
आशाओं,न्यूनताओं की दुनिया  
और न्यूनताएँ देखने से  
तुम्हारी आँखों को  
हो जाता है मोतियाबिंद  

हमारी दुनिया  
संघर्षों और निर्बलताओं की दुनिया है  
और निर्बलताओं के बारे में सोचने को  
शायद तुम्हारा मस्तिष्क नहीं देता इजाज़त  

तुम्हारी दुनिया में समाये हैं  
सैकड़ों वायरस  
जो मकडी के जाल की तरह  
फैलते जाते हैं  
हमारी दुनिया सत्य की दुनिया है  
और सत्य हमेशा संघर्षवान होता है  

जैसे हमारे अनेकानेक उत्पाद  
जन्म लेते ही तुम्हारे हो जाते हैं  
इसी तरह  
हमारे दुःख,दर्द क्यों नहीं ले लेते?  

हाँ  
जब तुम्हें लेने होते हैं पुरस्कार  
बड़े-बड़े सम्मान  
या चमचमाना होता है 
दूधिया रौशनी में  
तब तुम मिटाना चाहते हो 
हमारा अन्धकार  

पर हमारा अन्धकार तो  
हमारी परछाई बन गया है  
जीवन भर  
रहेगा हमकदम  
और उस पार का भी क्या कहना  
आखिर ईश्वर भी तो तुम्हारी खूँटी से बँधा है