Saturday, March 28, 2009

परछाई


बचपन में जब मैं गाँव की गलियों में चलता था
तब मेरे साथ चलती थी मेरी परछाई

वही परछाई ....
कभी लम्बी लगी कभी छोटी
कभी आगे तो कभी पीछे होती
कभी दीवारों पर चलती
और कभी पेड़ों को छूती

ऐसा भी हुआ ...
जब हमने अपनी परछाई को दूसरों की परछाई से बड़ा करना चाहा
और कभी दूसरों की परछाई कुचल देनी भी चाही
कभी आगे दौडे तो कभी पीछे हटे
किसी के सर पर पैर रखे तो किसी के हाथों से पैर मिलाये
इसी तरह दिन बीते अपने
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एक रोज जब मैं बड़ा हुआ
तो देखा मेरे साथ न थी वो परछाई
कहीं गायब हो गयी है
उसी की तलाश कर रहा हूँ

::: :) DC (: :::

एक तलाश


मैने बरसो तुम्हे तलाशा है
कई सदिया गुजर गयी है
तुम्हारी राह देखते हुए

दिन की तन्हाइयों में
या रात की गहराइयों में
सदा करता रहा आस
कब पूरी हो तुम्हारी तलाश

बादलों की ध्वनि में
मुझे सुनाई दी तुम्हारी आवाज़
और बसंती हवाओं में
महसूस हुआ तुम्हारा ही साज़

भोर के कोहरे में
दूर दिखाई देता तुम्हारा अक्स
बारिश की बूँदों में
मन को भिगोता तुम्हारा दृश्य

खामोश पगडंडी पे आहट की आस
चातक सी प्यास और नक्षत्र की तलाश
टूटते दरखतों और ढहते मकानों के बीच
करता रहा जीवन की तलाश

तुम जीवंत- अजीवंत प्रतिमानों में व्याप्त
या जीवन तुममें समाहित
पर मेरे ह्रदयांगण में है अटूट विश्वास
पूरी होगी तुम्हारी तलाश

::: :) DC (: :::

Friday, March 27, 2009

एक शिकायत





मुझे शिकायत है आईने से
नहीं दिखाता मुझे मेरा असली चेहरा
दिखाता है मुझे एक नकली नकाब में
जिसमें चेहरे पर शिकन की कोई रेखाएँ नहीं होती
और मुँह पर मुस्कराहट होती है
तब मेरे गालों के गड्ढे ढँक जाते है
और छिप जाती है बालों की सफेदी
मुझे लगता है कहीं ना कहीं कुछ गड़बड़ है
शायद आईना धूमिल पड़ गया है
या फिर मेरे ऐनक पर धूल जम गयी है...

::: :) DC (: :::

Sunday, March 22, 2009

:: आशियाना ::



जब तुम पहली बार मिले थे ,
तब एक तूफान सा उमड़ा था
और मैं भी कितना नादाँ था
तूफाँ में आशियाँ बना रहा था
..... ........ ......
तब किसी ने टोका नहीं
"अमाँ ये कैसा पागलपन है
तूफाँ में आशियाने बनाते हो
ऐसे आशियाने कब तक टिकते हैं"
अब भी सोचता हूँ कि किसी ने रोका क्यो नहीं
शायद आशियाना उजड़ते देखना चाहते थे
या किसी को इतनी फ़ुर्सत कहाँ.
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लेकिन जब मेरा आशियाँ खाक-ए-दफ़न हो गया था
तो एक ने पूछा था "मियाँ! तुम तो तूफाँ मे आशियाँ बना रहे थे ,क्या हुआ?"
कोई और बोला-"काश!
हम से हिदायत ली होती बनाने से पहले"
ये दुनिया आशियाँ दफ़न होने के बाद हितैषी बनती है
शायद आशियाँ उजड़ते देखने का शौक है
या दुनिया के पास पहले देखने को आँखें नहीं होती
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अब जबकि इस बात को बीते एक अरसा हो गया है
और आशियाँ से जुड़े ख्वाबो पर मिट्टी की तह जम गई है
इस मुकम्मल दुनिया को तब भी चैन कहाँ
किसी की हिदायत कानों पड़ती है
"भाई! आदमी के पास एक खुद का आशियाँ तो होना चाहिए
ऐसे कब तक रहोगे"
लेकिन मैं उन्हें कैसे समझाऊ
मुझे केवल तूफाँ में काम करने का शौक है
और आजकल जिसकी दस्तक होती है
वो तूफाँ नहीं बस एक हल्का सा झोंका है
जो दरवाजे को धकेल कर जाता है
दरवाजा धीरे-धीरे खुलता है और कुछ दूर जाकर रुक जाता है

::: :) DC (: :::