Wednesday, October 21, 2009

आवागमन


वे गहन वेदना के क्षणों में,
और गूंजते सन्नाटों में ,
अक्सर ढूँढा करती हैं
हमारी खुशियाँ |

जब वे जिया करती हैं
मिलने की तीव्र उत्कंठा लिए.
तब हम होते हैं
जल्दबाजी में ;
बघारते हैं
एक से बढ़कर एक थ्योरी ,
और भर देते हैं कूडेदान
बीमारी लिए अनेकानेक लिफाफों से |

जब वे लुटाना चाहती हैं
बेहिसाब प्यार,
तब हम ढूँढ रहे होते हैं
खुशियाँ ईजाद करने के नए तरीके ;
हमारी आँखों में होती हैं
कैबरे नाचती लड़कियां ,
और होठों पर रहती है
एक झूठी मुस्कान |

हम खा रहे होते हैं
ग्रीन वैली के रेस्तराँ में चिकन-पुलाव,
और रुक-रुक कर लेते हैं
शैम्पेन के घूँट ,
तब घोर अंधकारमय रातों में
वे रोटियाँ बेलते हुए
फूंकती हैं चूल्हे ,
और  रोक लिया करती हैं 
अश्रुपूर्ण नयनों को किसी तरह बरसने से  |

बचपन की पुचकार,दुलार,चुम्बन
और कंपकंपाती रातों में
छाती से चिपककर गुजारे दिन ;
सब भुला देते हैं हम
महान बनने की प्रक्रिया में |

एक दिन
जागते हैं हम
सदियों की निद्रा से,
और अर्द्ध-रात्रि में
देखे सपने की तरह
जब उतरते हैं चमचमाती कारों से,
तब वे
अपनी पथराई आँखों में समाये सपने साकार करने
और देखने हमें
प्रतिक्षण,प्रतिपल
एक सुदूर जहान को
कर चुकी होती हैं
गमन | 

Saturday, October 10, 2009

खामोशी

उन दिनों
मैं समझा करता था
तुम्हें सर्वस्व ,
और भटकता था
तुम्हारे साहचर्य में
बना हुआ
'अहम् ब्रह्मास्मि' |

उस भोले से मस्तिष्क के
सबसे सुदूर कोने को भी
कहाँ ज्ञात था ,
कि जब हम गुजार रहे होंगे
निश्चिंत रातें
सोफे पर लम्बी टांगें पसारकर,
तुम आओगी एक दिन
मरुस्थलीय हवाओं सरीखी,
और उड़ा ले जाओगी सब कुछ ;

और स्थिति ऐसी होगी
दस बाई दस की खूंखार दीवारों से चिपककर,
उन काली स्याह रातों में
हम ताका करेंगे,
अविरल गति से झूलता पंखा ;
और तुम करती हुई वीभत्स अट्टाहास
कभी पंखे से लटकाकर
हमें बना दोगी
चमगादड़

जाने तुम कौन हो !
तुम्हारा वजूद आज तक कभी
कम्पायमान हुआ ही नहीं;
उन दिनों जब प्रेम नहीं करता था
और आज जब प्रेम करता हूँ;
हाथों में चिपकी
जिरेनियम की पत्तियों सरीखी
तीखी सी महक
तुम मिटती ही नहीं |

आज
तुम्हारे सामने
गिड़गिडाता हूँ,
सर पटकता हूँ ,
और करता हूँ लम्बी-लम्बी
संस्कृतबद्ध क्षमा-याचनाएँ ,
मैं सचमुच चाहता हूँ निजात ;
प्लीज़ चली जाओ
और बख्श दो मुझे
एक हलकी सी हंसी
फीकी ही सही ;

मुझे खाना है
माँ के हाथ का बना चूरमा
और करनी हैं
बहनों की शादी |

Wednesday, October 7, 2009

साक्षात्कार

उसे जगाया गया था
कच्ची नींद से
इस एकाकी यात्रा के लिए
आखिर उसके निर्निमेष पलकों में
यही तो समाया था
अनेकानेक वर्षों से

अपना समस्त चेतन,शौर्य
और निश्चय
उस क्षण में उँडेलकर
वह बढ़ने लगा

कान नहीं थे उसके पास
सवाल सुनने को
और कदम अनुमति नहीं देते थे
थम जाने को
वह परिधि के दायरे से बाहर निकल
चूस लेना चाहता था नियति का लहू

शायद वह अधनींदा था
या फिर वह कौन अदृश्य शक्ति थी
जो उसे खींचे जा रही थी
एक प्रकाश की ओर

एक दिन
उसके विचरण का आकाश सिमट गया
जल सूख गया
और राहें ख़त्म हुई
पर ये क्या?
जो दिख रहा था
वह न था
जो उसकी उनींदी आँखों में व्याप्त था
और जिसके लिए वह बढ़ता चला आया था
अकेला
स्वयं की पग-ध्वनि सुनता
..वह क्या था
जो आज उसे बिना कामना के ही मिला था

वह मृत्यु नहीं थी
न ही आपदा थी
उस दिन
वह किशोरवय मन
पहली बार खड़ा था
अथाह शून्य के समक्ष

क्षुद्र,
असहाय
और अनिश्चयग्रस्त

.......