Sunday, March 11, 2012

"जो पढ़कर अच्छी लगे, वह अच्छी कविता है "

कभी-कभी हरी घास पर बैठे हुए, पेड़ों से टपकते पीले पत्तों और गाड़ियों से आती होर्न की आवाजों के बीच आप एक कबूतर को पिछले एक घंटे से देखे जा रहे होते हैं, तब जाहिर है वह कबूतर नहीं होता जिसे आप देख रहे होते हैं या वह होर्न की आवाज़ नहीं होती जिसे आप सुन रहे होते हैं. वह आपका अतीत होता है, जो आपको वीतरागी बना देता है. ऐसी स्थिति में अधिकांशतः आपको अपना बचपन याद आता है.
ये बच्चों की कवितायेँ हैं या दूसरे शब्दों में, हर आदमी के बचे-खुचे बचपन की कवितायेँ हैं, जो हाल ही में पढ़ी. ये ऐसी कवितायेँ हैं, जिन्हें समझने के लिए आलोचकों की जरूरत नहीं होती, जिन्हें पढ़ते हुए आप अपनी विचारधारा को एक किनारे रख देते हैं और जो आपकी सेहत के लिए नुकसानदेह नहीं होती.

१: "बच्चे" (इजेत साराल्जिक)

बच्चो, मैं हैमलेट नहीं
या फ्लोरेंस के ऊपर बहता बादल नहीं,
तुम मुझे जानते हो
बायीं ओर वाली पहली गली में हैं घर मेरा |

पढाई ख़त्म कर जिस दिन तुम
नोट्स और किताबों को गट्ठर जला दोगे
युद्ध-समाप्ति के बाद सीमा से तुम लौट रहे होगे
या घूमते-फिरते इजिप्ट या कहीं और से लौट रहे होगे;
प्रथम प्यार की अग्नि-ज्वाला में जले बिना तुम
उससे अधिक निखरकर उभरोगे;
प्रमोशन पा-पाकर जब तुम उद्योग-देवता
बन जाओगे
और जब, मेरी ही तरह
तुम्हारे सर के बाल सफ़ेद हो जाएँ,
बच्चो, जब जीवन का आधा वक़्त ख़त्म हो जाये,
अपनी माताओं से कहना
कि तुम दुबारा जन्म लेना चाहते हो |

२: "मुंह में दूध की बिटकिनी* डाले तामारा** क्या कहता है" (इजेत साराल्जिक)

सिर्फ इतना
बिल्ली के बच्चों को कोई परेशान न करे
भालू के बच्चों को जंगल में कोई गोली न मारे
गोले-बारूद से बार्च के पेड़ मुरझा न जाएँ
दुनिया के सारे लोग दोस्त बनकर रहें
मौत जिनको ले गयी है
फिर से लौटा दे उन्हें
भूकंप न हो
सारे विमान सुरक्षित उतरें
मेरे पापा अपनी कविता ख़त्म कर लें
सारे पापा कवि बन जाएँ|

* दूध की बोतल का निप्पल
** बच्चा

३: आदिवासी ओरांव-गीत

माँ, गाली देगी तो
जी भर कर गाली दे,
पर घर में|

गाँव के अखाड़े में
नाचते समय गाली मत देना;
वहाँ मेरी उम्र के
मेरे दोस्त होते हैं
और धांगडियाँ* भी होती हैं
सह नहीं पाऊंगा मैं |

* आदिवासी अविवाहित कन्याएँ
इस कविता को पढ़कर मैं हँसे बिना न रह सका (खिलखिलाने से कम, पर मुस्कुराने से ज्यादा)

४: बड़ों का समय (तानिकावा सुंतारो)

कोई बच्चा
हफ्ते भर में
हो जाता है
कितना चतुर चालाक
सीख लेता है पचास नए शब्द
बदल लेता है खुद को कितना |

हफ्ता बीतने तक
कोई बड़ा व्यक्ति
जैसा था, वैसा ही रहता है;
हफ्ते भर बाद भी वह
पत्रिका का पन्ना
पलटता रहता है ;
बच्चे को डांट लगाने तक में
हफ्ता भर लग जाता है बड़े को |

५: दुनिया का नक्शा (यून सेक जूंग)

घर से बनाकर लाने को मुझसे
कहा गया है दुनिया का नक्शा
कल रात भर
लगा रहा मैं
बना न पाया अब तक नक्शा |

न तुम्हारा देश, न मेरा देश
तुम्हारा राज, मेरा राज
न होकर ऐसा यदि
होती सारी दुनिया एक देश
तब होता कितना आसान
बना पाना उसका नक्शा |

Wednesday, February 29, 2012

"विल यू एक्सक्यूज़ मी प्लीज़"

दिन सूखते जाते हैं और मैं टूटता जाता हूँ. जितनी मजबूती से आपने ज़िन्दगी को बाँध रखा था ( या भ्रम पाल रखा था ), ज़िन्दगी आपसे उतनी ही दूर होती जाती है (कुटिल मुस्कान छोड़ती हुई). जितने लोगों से मिलने की कोशिश करते हैं, उतने ही अकेले होते जाते हैं. खुशियों के पौधे को एक चिड़िया काटती जाती है. उसे बचाने की कोशिश करते हैं, तो अर्थहीन में (कम से कम ऐसा आपका मानना है) अर्थ खोजता हुआ पाते हैं और ऐसा मानकर सब कुछ त्याग देते हैं.

दिस वर्ल्ड इज अ क्रुअल प्लेस. यह आपको उसी दलदल में खींचता है, जिसमें यह खुद फँसा है (मार्क्सवादियो क्षमा करना). दुनिया को आपके उदास चेहरे से उतनी ही कोफ़्त होती है, जितनी सत्ताधारियों को विद्रोहियों से. एंड यू स्टार्ट टू बिलीव, इट कैन नॉट अफर्ड अ पर्सन लाइक यू (इस्पेशली इन दिस इरा).

'सपनों का मर जाना खतरनाक होता है', पर उससे भी ज्यादा खतरनाक होता है उन्हें मरते हुए देखना. हर चीज़ से आपका भरोसा उठ चुका होता है और आगे आने वाले १० मिनट का हवाला देने में भी खुद को असमर्थ पाते हैं.

एवरीथिंग इज नॉट फाइन, सेन्योरीटा. यदि अभी भी मुश्किल हो रही है समझने में, तो मैं सीधे-सीधे अपना दर्द बयाँ कर देता हूँ कि 'ज़िन्दगी बड़ी लम्बी है और कटती नहीं है' (बहुत दिनों पहले मुझे ये बड़ी छोटी लगी थी. वेल, बोथ सिचुएसंस मेड मी सेड). इस आग के दरिया में डूबना ही डूबना है, निकलना नहीं है (कूदना तो छोड़ ही दो).

और इतनी बड़ी ज़िन्दगी को जीने के लिए गैरों के अहसान लेने ही पड़ते हैं .... 'ब्लैक' तुम्हारे बड़े अहसान हैं, जिनके तले मैं दबा जाता हूँ.

होप यू विल एक्सक्यूज़ मी. आय एम नॉट गुड एट कीपिंग प्रोमिसेस, यू नो दैट.

Sunday, March 6, 2011

अंतर्विरोध

१:
श्वेत के साथ हुआ
कृष्ण का प्रादुर्भाव ;
जीवन के साथ मौत का ,
स्वागत के साथ विदा का ;

'असत्य' का होना भी
उतना ही सत्य है,
जितना कि सत्य का होना ;

इस तरह
कुछ भी नहीं रह जाता
दुनिया का सत्य ;
शाश्वत हैं तो केवल
अंतर्विरोध ,
जिनके बूते
बनती है दुनिया
बदलती है ,
और फिर से चलती है |

२:
'साहसी बनना'/ बन के रह गया था
दुनिया का सबसे बड़ा षड़यंत्र;

बेहतर था
बतियाना साहसिक कारनामे,
सोचना - विचारना,
और उपदेश देकर बन जाना बुद्धिजीवी ;
परन्तु जैसे ही आपने चाहा साहसी बनना
वैसे ही नकार दिया गया
दुस्साहसी कहकर |

३:
अस्वीकार्य था उन्हें
अपने अस्तित्व के चारों ओर
किसी छाया का भी दिखना ;
तब कैसे स्वीकार्य होता
स्वेच्छा से अपने अस्तित्व का खात्मा ;
इस तरह
'ह्रदय-परिवर्तन' बन गया था
दुनिया का एक भद्दा मज़ाक |
वां वो गुरुरे-इज्जों-नाज़ यां यह हिजाबे-पास वज़अ
राह में हम मिलें कहाँ, बज़्म में वो बुलाये क्यों
(साभार - ग़ालिब )

Wednesday, December 8, 2010

कुछ अधार्मिक बातें

तुम्हें जब दिखानी थी रौशनी
तब-तब तुम
पहनाते रहे बेड़ियाँ
और कैद करते रहे
घुप्प अंधकारों भरे तहखानों में

तुम्हें जहाँ बसानी थी बस्तियाँ
उजाड़कर उन्हें
तुम बनाते थे महल

जब अपेक्षा थी
तुम करोगे दुनिया को संगठित
तब पथभ्रमित कर
तुम पैदा करते थे दरारें

"अत्यंत भयानक होता है
सच्चाई को जानना
जानना झूठों को
अपने भाग्य को पहचानना

भरभराकर टूट पड़ना
बचपन के महल
जीने की चाह में
पीते रहे गरल

वह नहीं है बाहर
न ही मूर्तिमानों में
निश्चित रूप से
नहीं है आसमानों में

अब और नहीं होती
तानाशाही स्वीकार
ढोया नहीं जाता
दंडों का भार

अत्यंत भयानक होता है
सच्चाई को जानना
जानना झूठों को
अपने भाग्य को पहचानना "


क्योंकि मैं नहीं देखता तुम्हें
बादलों में,
हवाओं में,
या शून्य में

क्योंकि मैं नहीं सुन सकता तुम्हें
गड़गड़ाहट में,
घंटों में,
अजानों में

क्योंकि मैं नहीं फांद सकता पर्वत
बिना क्रमशः डग धरे

क्योंकि मैं नहीं लुट सकता
अमरत्व पाने के लिए

क्योंकि अस्वीकार है मुझे 'भाग्य'
हर प्रश्न का उत्तर

क्योंकि तुम्हारा दर्शन
शुरू और ख़त्म होता है
तुम्हारे जन्मदाता के साथ

इसलिए,
हे दुनिया के महान धर्मो! (आप कहेंगे कि वाहकों)
मुझे क्षमा करना
चाहें तो आप मुझे समझ सकते हैं
माओवादी, नास्तिक
या फिर चाइनीज़ स्पाई
और पटक सकते हैं नरक में
या अगले जन्म में बना सकते हैं 'सूअर'
पर और नहीं पिया जाता
छलावे में ज़हर |