कैमरे छिपे हुए हैं हर शहर हर गली,
और जंगलों में आजकल रहते हैं नक्सली |
बसंती परेशान है, मिले तो कहाँ मिले ||
.........इस उद्देश्यहीनता में छिपा हुआ उद्देश्य है कि वह उद्देश्य पुनः उद्देश्यहीनता है,बुझ जाने की मांग है........ .....अभिप्राय मैं नहीं जानता,तुम्हें जानता हूँ, और जानता हूँ कि जितने स्वप्न मैंने देखे हैं,सब तुममें आकर घुल जाते हैं.........("शेखर: एक जीवनी" से )
Monday, April 12, 2010
Thursday, February 11, 2010
उद्विग्न-व्याकुलता
मेघ पुनः संदेशा लाए,
मग में कोई नयन बिछाए |
कैसे आऊँ द्वार तुम्हारे ,
तेरे-मेरे नेह के पथ में
घिर आते हैं जग के साए |
निशा गयी और प्रात हुआ अब,स्वप्न-आकृति छूटी मन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||
धूसर दिवस आज प्रिय तुम बिन,
विप्लव की बेला में दुर्दिन |
मुखर मौन संकेत बताते ,
अश्रुपूर्ण सारी रातों भर
विरहा मन रहता है खिन ||
ज्ञान सुप्त है, क्रिया नहीं कुछ, इच्छा क्यों पूरी हो मन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||
अमराई की रुत गयी अब ,
संवेदन के भ्रम-जाल थे सब |
मोती पृथक-पृथक होना ही था
फैली माला टूट गयी जब |
भूले खग की नियति अभागी,फिर क्यों छाँव मिले मधुबन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||
मग में कोई नयन बिछाए |
कैसे आऊँ द्वार तुम्हारे ,
तेरे-मेरे नेह के पथ में
घिर आते हैं जग के साए |
निशा गयी और प्रात हुआ अब,स्वप्न-आकृति छूटी मन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||
धूसर दिवस आज प्रिय तुम बिन,
विप्लव की बेला में दुर्दिन |
मुखर मौन संकेत बताते ,
अश्रुपूर्ण सारी रातों भर
विरहा मन रहता है खिन ||
ज्ञान सुप्त है, क्रिया नहीं कुछ, इच्छा क्यों पूरी हो मन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||
अमराई की रुत गयी अब ,
संवेदन के भ्रम-जाल थे सब |
मोती पृथक-पृथक होना ही था
फैली माला टूट गयी जब |
भूले खग की नियति अभागी,फिर क्यों छाँव मिले मधुबन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||
Saturday, November 28, 2009
आग्रह
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गुजर चुकी हैं
कौशाम्बी और नालंदा की सभ्यताएं ,
बीत गया है
मौर्य और गुप्त वंशों का स्वर्ण-काल ,
और मिट गया है
आदिमयुगीन ताम्र-युग |
फिर घोर उद्योगवाद के दौर में
अयोध्या को पाषाण-युग में कैद कर
आपकी पथराई सोच
चाहती क्या है ?
कृपा करो अयोध्या पर !!
वह आजाद होना चाहती है
अतीत के बियाबान से |
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Wednesday, November 25, 2009
नींद को
जब स्वप्नदृष्टा दुनिया
मसरूफ होती है
स्वप्नों की और स्वप्नों सी रंगीनियों में ,
तब देखकर मैं
पल-पल गुजरता वक़्त ,
इंतज़ार किया करता हूँ
तुम्हारे आगमन का |
जानता हूँ,तुम नहीं आओगी
और न ही बुलाओगी ,
इसीलिये सुनने लगता हूँ
तुम्हारे लिए सुरक्षित रखा
मोजार्ट का संगीत ;
पढ़ने लगता हूँ
नए-पुराने उपन्यास;
दोहराता हूँ गिनतियाँ
पहले सीधी फिर उलटी ;
और सोचने लगता हूँ
पतझड़ का पेड़/टूटता कनेर,
झूलती रस्सी/डूबती बस्ती ,
अवन्ती,अनाम/भूला हुआ नाम,
बढ़ता उधार/नवीं कक्षा का प्यार |
इसी तरह, सोच-सोचकर
तुम्हें बुलाने के नए तरीके,
खो जाना चाहता हूँ
कई छोर जोड़कर बनी
खयालों की जंजीरों में ;
और मेरे इन तमाम प्रयासों के बावजूद
जब नहीं आती हो तुम ,
तो जानती हो
खा लेता हूँ दो-चार गोलियाँ,
पटक लेता हूँ दीवार पर सर,
और आखिर में
लिख लिया करता हूँ
कुछ बेरहम कवितायें,
आधी रात को ;
जो धारण कर रौद्र रूप
मारा करती हैं
दिन भर |
कुछ इस तरह के बन गए हैं
आजकल के दिन,
और आजकल की रातें,
और महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी जरूरत
पलकर अभाव में
तुम्हारे |
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मसरूफ होती है
स्वप्नों की और स्वप्नों सी रंगीनियों में ,
तब देखकर मैं
पल-पल गुजरता वक़्त ,
इंतज़ार किया करता हूँ
तुम्हारे आगमन का |
जानता हूँ,तुम नहीं आओगी
और न ही बुलाओगी ,
इसीलिये सुनने लगता हूँ
तुम्हारे लिए सुरक्षित रखा
मोजार्ट का संगीत ;
पढ़ने लगता हूँ
नए-पुराने उपन्यास;
दोहराता हूँ गिनतियाँ
पहले सीधी फिर उलटी ;
और सोचने लगता हूँ
पतझड़ का पेड़/टूटता कनेर,
झूलती रस्सी/डूबती बस्ती ,
अवन्ती,अनाम/भूला हुआ नाम,
बढ़ता उधार/नवीं कक्षा का प्यार |
इसी तरह, सोच-सोचकर
तुम्हें बुलाने के नए तरीके,
खो जाना चाहता हूँ
कई छोर जोड़कर बनी
खयालों की जंजीरों में ;
और मेरे इन तमाम प्रयासों के बावजूद
जब नहीं आती हो तुम ,
तो जानती हो
खा लेता हूँ दो-चार गोलियाँ,
पटक लेता हूँ दीवार पर सर,
और आखिर में
लिख लिया करता हूँ
कुछ बेरहम कवितायें,
आधी रात को ;
जो धारण कर रौद्र रूप
मारा करती हैं
दिन भर |
कुछ इस तरह के बन गए हैं
आजकल के दिन,
और आजकल की रातें,
और महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी जरूरत
पलकर अभाव में
तुम्हारे |
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