कलमों की नोंकें टेढ़ी हो जाती हैं
आपके व्यवहार की शिष्टता लिखते हुए
और जुबान तालू से चिपक जाती है
आपके सिद्धांतों की परिपुष्टता के आगे
इसलिए कभी साहस नहीं जुटा पाता
आपका गुणगान करने का
पर आज मेरे हाथ फड़फड़ा रहे हैं
और मस्तिष्क उद्वेलित हो उठा है
अब आपका महिमा मंडन किये बिना
नियंत्रण नहीं होता
मेरे भी चक्षु गवाह हैं
कि सत्ता आदमी को
हैवान बना देती है
पर इतना भी नहीं
कि जिन्हें तुम अपना(?) कहते हो
उन्हीं को महसूस न करो
आपको कभी विचार आया
जब इस देश का
एक अदना सा आदमी
माथे पर निराशा,कुंठा की बूँदें समेटे
और सर पर श्रम और आशा की गठरी उठाये
जब इन कंगूरों और अट्टालिकाओं वाले स्मारकों से गुजरेगा
तो क्या उसका सर श्रद्धा से नतमस्तक होगा?
क्या आप महसूस करती हैं
कि रंगबिरंगी रोशनी से गुजरते हुए
वह मन में दोहराएगा
"बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मं शरणम् गच्छामि"
जीवन के विशेष दिवसों के भव्य आयोजनों
और स्मारकों,उद्यानों के निर्माण के समय
कभी आपके जेहन में उन गंगूरामों की याद भी आ जाया करे
जिनके अभाव कर रहे हैं उनकी हत्याएँ
या उस सुधा की
जो अपनी दीदी की शादी की फ़िक्र में
इतनी बड़ी हो गयी है
कि खुद शादी लायक हो गयी है
कभी आपकी करोड़ों,अरबों की योजनाओं का
एक तुच्छ हिस्सा उन्हें भी मिले
आपने अनादर किया है
अपने प्रदेश की उस ज़मीन का
जहाँ बुद्ध ने शिक्षासूत्र पिरोये
और उन अम्बेडकर का
जो जीवनपर्यंत मूर्तिपूजा के विरोध में रहे
अब उनकी मूर्तियाँ बनाकर
आप उन्हीं के सिद्धांतों की अवमानना करती हैं
काश आप कभी समझें
कि श्रद्धा
ऊँचे-ऊँचे मेहराबों वाले घेरों
और आदमकद मूर्तियों में नहीं उपजती
और ना ही छायादार उद्यानों में
ठहरा करती है
पहले उनके सिर से वो गठरी उतारो
जो सदियों से रखी है
और चेहरे के वे जख्म भर दो
जो बिन मांगे की पहचान बन गए हैं
फिर थमा देना मूर्तियाँ
और दिखा देना
उद्यानों की रंगीनियाँ
(दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की राजनीति को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले और सबसे बड़े प्रदेश की माननीया मुख्यमंत्री के नाम)
.........इस उद्देश्यहीनता में छिपा हुआ उद्देश्य है कि वह उद्देश्य पुनः उद्देश्यहीनता है,बुझ जाने की मांग है........ .....अभिप्राय मैं नहीं जानता,तुम्हें जानता हूँ, और जानता हूँ कि जितने स्वप्न मैंने देखे हैं,सब तुममें आकर घुल जाते हैं.........("शेखर: एक जीवनी" से )
Sunday, September 13, 2009
Friday, September 11, 2009
अभिलाषा
वे भुलाती हुई
हमारी सारी वेदनाएँ और सुख
समय और उम्र
जन्म ले लेती हैं
जटिल से जटिल परिस्थितियों में
उनके आश्रय में हम
लहरों की अंगडाई सुला देते हैं
आकाश की ऊँचाई मिटा देते हैं
आँधियों में दीप जलाने लगते हैं
पत्थर की छाती पर नव-अंकुर उगाने लगते हैं
वे उडाकर हमारी नींदें
चाहती हैं नियति का सर कलम करना
ऐसी ही होती हैं अभिलाषाएँ
छोटी,बड़ी,स्वान्तःसुखाय या परिजनहिताय
जैसे मेरी अभिलाषा कहती है कि
जब मैं नव-सृष्टि के सृजन को आगे बढूँ
तो तुम आओ मेरे साथ
और जब शिथिलता मेरे बदन पर आकर बंधक बनाने का करे प्रयास
तो तुम मुझे प्रेरित करती
अपने हाथों से पिलाओ...ओक भर पानी
हमारी सारी वेदनाएँ और सुख
समय और उम्र
जन्म ले लेती हैं
जटिल से जटिल परिस्थितियों में
उनके आश्रय में हम
लहरों की अंगडाई सुला देते हैं
आकाश की ऊँचाई मिटा देते हैं
आँधियों में दीप जलाने लगते हैं
पत्थर की छाती पर नव-अंकुर उगाने लगते हैं
वे उडाकर हमारी नींदें
चाहती हैं नियति का सर कलम करना
ऐसी ही होती हैं अभिलाषाएँ
छोटी,बड़ी,स्वान्तःसुखाय या परिजनहिताय
जैसे मेरी अभिलाषा कहती है कि
जब मैं नव-सृष्टि के सृजन को आगे बढूँ
तो तुम आओ मेरे साथ
और जब शिथिलता मेरे बदन पर आकर बंधक बनाने का करे प्रयास
तो तुम मुझे प्रेरित करती
अपने हाथों से पिलाओ...ओक भर पानी
Thursday, September 10, 2009
रात्रि बेला की ख्वाहिशें
गली-गली बने शिवालयों में
नीरव खामोशी
घुप्प अंधकार
और धुंधले चित्रों की क्रमहीन श्रंखला
मेरे प्यारे बनारस की धरती पर
मैं भरा हूँ
तुम्हारी दुनिया में
तुम्हारे आभामंडल की दुनिया
अंतहीन जैसे समय
चमकीली जैसे तारे
तुम्हारे बारे में सोचना
जैसे निहारना
दुग्ध-धवल झीनी चादर से
सुदूर आसमान
या सुनना
भादों के किसी बरसाती दिन
बूंदों का टिपटिपाना
या पढ़ना दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता
तुम्हारा ख्याल
जैसे
अवरोहों को ठुकराती
पीत पुष्प पल्लवित नदी
या एक ज्योति
जो काल-कवलित शलभों को
कर देती है आलौकिक
मिट जाती है
बदन पर पुती हुई कालिख
और लज्जित मस्तक
हो जाता है निष्कलंक
जो नसीब हो तेरा स्पर्श
सारा विश्व बन जाता है गौड़
जो मिले तेरे आँचल में सोने का सुख
पतझड़ की किसी रात में
जो असमय जाग उठूँ
कोई भुतहा सपना देखकर
तो झकझोरता है मेरा अवचेतन
मुझे तोड़ देने चाहिए
लोहे के सींखचे
और गिरा देनी चाहिए
कंक्रीट की दीवारें
अपनी स्वतंत्रता के लिए
माँ ....
वे कौन लोग है??
जो हमें कैद कर गए हैं
खुली हवाओं में
नीरव खामोशी
घुप्प अंधकार
और धुंधले चित्रों की क्रमहीन श्रंखला
मेरे प्यारे बनारस की धरती पर
मैं भरा हूँ
तुम्हारी दुनिया में
तुम्हारे आभामंडल की दुनिया
अंतहीन जैसे समय
चमकीली जैसे तारे
तुम्हारे बारे में सोचना
जैसे निहारना
दुग्ध-धवल झीनी चादर से
सुदूर आसमान
या सुनना
भादों के किसी बरसाती दिन
बूंदों का टिपटिपाना
या पढ़ना दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता
तुम्हारा ख्याल
जैसे
अवरोहों को ठुकराती
पीत पुष्प पल्लवित नदी
या एक ज्योति
जो काल-कवलित शलभों को
कर देती है आलौकिक
मिट जाती है
बदन पर पुती हुई कालिख
और लज्जित मस्तक
हो जाता है निष्कलंक
जो नसीब हो तेरा स्पर्श
सारा विश्व बन जाता है गौड़
जो मिले तेरे आँचल में सोने का सुख
पतझड़ की किसी रात में
जो असमय जाग उठूँ
कोई भुतहा सपना देखकर
तो झकझोरता है मेरा अवचेतन
मुझे तोड़ देने चाहिए
लोहे के सींखचे
और गिरा देनी चाहिए
कंक्रीट की दीवारें
अपनी स्वतंत्रता के लिए
माँ ....
वे कौन लोग है??
जो हमें कैद कर गए हैं
खुली हवाओं में
हमारी दुनिया बहुत भिन्न है
सृजन का सौंदर्य हो
या धर्म की पराकाष्ठा
न्याय,संस्कृति,साधन
बल,बुद्धि और धन
साथ में
भक्ति,ढोंग,पाखण्ड
क्रोध,शोक,रोग
वासना और निर्लज्जता
सब कुछ तुम्हारे साए में रहते हैं
हमारे पास है केवल
पसीने और कीचड़ की दुर्गन्ध
हमारे शब्द सीमित हैं
और शब्दों के मायने भी
हमारी भुजाएँ
पहाड़ काटने वाली शक्ति पाकर
बँधी रहती हैं
और हमें नहीं सिखाया जाता
इच्छाएँ करना
बल्कि हम स्वतः ही सीख जाते हैं
इच्छाओं और अभिलाषाओं का दमन करना
हमारे सपनों को खा जाते हैं
युग्मों में उड़कर आने वाले
बड़ी चोंचों वाले गिद्ध
और यदि बच भी जाएँ
तो पड़े-पड़े हो जाते हैं जंग-ग्रस्त
तुम्हारी और मेरी दुनिया
इतनी भिन्न है कि
हम अलग-अलग प्रजातियों का
प्रतिनिधित्व करते हैं
तुम्हारी दुनिया चमचमाती है
कारों में दौड़ती है
और समय से पहले बालिग़ हो जाती है
तुम्हारी दुनिया में
देशी,विदेशी संगीत की लहरियाँ हैं
मैकडोनाल्ड से लेकर
इन्टरनेट तक का
खुशहाल संसार है
तुम्हारी दुनिया को
एकरसता से मोहभंग भी हो जाता है
इसलिए
गगनचुम्बी इमारतें बनाती है
करोड़ों के जुए खेलती है
और कभी-कभी
क्लबों में फूहड़ता से नाचने भी लगती है
हमारी दुनिया
बरगद के ठूंठ किनारे बने
मटमैले छप्परों में जन्म लेती है
गँदले नालों में पलती है
और बिना बोर्नवीटा खाए वृद्ध हो जाती है
समय से पहले
हमारी दुनिया
कारखाने सिर पर उठाकर चलती है
चैत की गर्म दुपहरी में जीती है
कोयलों में पलती है
और गुमनाम होकर वहीं दफ़न हो जाती है
हमारे बदन में भरी हुई है
असहनीय दुर्गन्ध
और हमारे चेहरे पर हैं
कीचड़ के धब्बे
जिन्हें तुम हिकारत भरी नज़रों से देखा करते हो
हमारी दुनिया है
आशाओं,न्यूनताओं की दुनिया
और न्यूनताएँ देखने से
तुम्हारी आँखों को
हो जाता है मोतियाबिंद
हमारी दुनिया
संघर्षों और निर्बलताओं की दुनिया है
और निर्बलताओं के बारे में सोचने को
शायद तुम्हारा मस्तिष्क नहीं देता इजाज़त
तुम्हारी दुनिया में समाये हैं
सैकड़ों वायरस
जो मकडी के जाल की तरह
फैलते जाते हैं
हमारी दुनिया सत्य की दुनिया है
और सत्य हमेशा संघर्षवान होता है
जैसे हमारे अनेकानेक उत्पाद
जन्म लेते ही तुम्हारे हो जाते हैं
इसी तरह
हमारे दुःख,दर्द क्यों नहीं ले लेते?
हाँ
जब तुम्हें लेने होते हैं पुरस्कार
बड़े-बड़े सम्मान
या चमचमाना होता है
दूधिया रौशनी में
तब तुम मिटाना चाहते हो
हमारा अन्धकार
पर हमारा अन्धकार तो
हमारी परछाई बन गया है
जीवन भर
रहेगा हमकदम
और उस पार का भी क्या कहना
आखिर ईश्वर भी तो तुम्हारी खूँटी से बँधा है
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