Saturday, August 25, 2012

"षड़यंत्र"

हो सकता है 
आपको एहसास न हो

पर आपके जन्म के बाद से 
स्कूलों में क्रूर शिक्षकों के हवाले कर दिया जाना,
पतंग उड़ाये जाने से रोकना;
मार्क्स, स्कॉलरशिप, 
ऊँचे विश्वविद्यालय, नौकरियाँ 
पैसा, शादियाँ;
सब कुछ हिस्सा है ,
सांड से बैल बनाये जाने की प्रक्रिया का |

स्वतंत्र से पालतू बनाये जाने का ,
एक ही षड़यंत्र है
यह सब |

Saturday, August 18, 2012

"________"

हर दंगे-फसाद के दौरान 
हम इतिहास में लौट आते हैं ; 
खूब अच्छी तरह ढूँढ़ते हैं कारणों को, 
अपने इंटेलेक्चुअल होने का परिचय देते हुए ; 
और 
दंगाई आगे बढ़ते जाते हैं |

Saturday, July 28, 2012

"________"

मैं लिखना चाहता हूँ 
एक कविता 
कि समेट लूं सारा दर्द
और उनके साये में बसी तुम्हारी ज़िन्दगी ;
फिर जब मैं आऊं तुम्हारे पास,
तो समेट लो तुम
मुझे अपने आँचल में |

मैं भुला देना चाहता हूँ 
तुम्हारे सारे दुःख, 
सारे दुस्वप्न, 
जिन्होंने 
रोक रखा है तुम्हें 
देखने से,
इस हसीन मौसम के नज़ारे |

मैं तुम्हें उठा के वहाँ से 
जहाँ हो तुम, 
बिठा देना चाहता हूँ वहाँ,
जहाँ से दिखती है 
तुम्हारी खिलखिलाती हंसी |

मैं चाहता हूँ ये ,
मैं चाहता हूँ वो ,
रोज़-ओ-शब-ओ-शाम-ओ-सहर,
हर पल, निश्चल ;

पर जाने कौन है , 
जो हमारे चाहने के बावजूद 
मटिया-मेट कर जाता है सब कुछ ;
और मैं सोचता रह जाता हूँ
कि चाहने से आखिर क्या होता है ?

"उसके साथ रहकर"


उसके साथ रहकर मैंने जाना
कि विद्रोह करना अपराध नहीं है, 
पर विद्रोह न करना है ;
और गुलामी की परिस्थितियों में जीते रहना
आपका आदमी न होकर 
हीरामन तोता होना है |

उसके साथ रहकर मैंने जाना
कि 'क्रान्ति' महज़ किताबों में नहीं मिलती,
नहीं पूछे जा सकते 
औरतों से केवल घर-परिवार के ही सवाल |

उसके साथ रहकर 
पृथ्वी को पकड़कर घुमाया जा सकता था, 
आसमान दूर नहीं रह जाता था
और सागर बन जाते थे हमारी 
गोदौलिया वाली रोड के गड्ढे |

उसके साथ रहकर 
कितना आसान था ,
अपनी लाश को फेंक देना |

--(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता से प्रेरित)

"डर"


उस घर को 
बचाए रखने की 
तमाम लब्बो-लुआब के बाद,
उखड़ ही जाता है चूरा |
कितनी भी मिट्टी लगा दो 
सान के,
पत्तियों संग चिपका दो 
गीली करके, 
पर कुछ दिन बाद 
चटक ही जाती है ,
बिखर ही जाती है 
और दिखने लगता है 
भीतर का नंगापन |

उपाय है एक 
कि बना लिए जाएँ 
पक्के घर, सीमेंटेड,
पर उसके लिए तोड़ने होंगे,
पुराने घर 
.
.
और ऐसा सोचना ही डराता है |

दो कविताएँ

१. "मुन्नी के लिए "

चलो दोस्तों, 
आज हम सीढियां लगाकर 
आसमान पर चढ़ते हैं,  
तोड़ लाते हैं बीस-तीस तारे,
काट लेंगे थोड़े से बादल  
और कुछ रंग मार लेंगे इन्द्रधनुष से | 

फिर बादलों पर  
बिखेरकर रंग, 
उनके ऊपर चिपका देंगे तारे 
और बनाकर उसका गुलदस्ता 
रख देते हैं मुन्नी की झोपड़ी में | 

उसको जन्मदिन का तोहफा दे पाए, 
इतने पैसे नहीं हैं 
उसकी माँ के पास |

इसलिए दोस्तों,
हम सब मिलकर देते हैं 
आज मुन्नी को, 
उसके जन्मदिन पर 'सरप्राइज़' |

२. "बस, कुछ दिन और"

इस भयावह समय में पैदा हुए, 
मेरे देश के बच्चे ,  
बस, कुछ दिन और |

मैं समझ सकता हूँ 
तेरी आँखों की उदासी, 
मैं जानता हूँ तेरी पीड़ा,
मैं महसूस कर सकता हूँ, 
तेरे सीने की जलन |

मैं जानता हूँ कि 
फूल पर तितली का बैठना, 
चिड़ियों का चहचहाना 
और रात को सपने में परियों का आना, 
इस  सब की जगह 
तूने सुनी हैं  
गोलियों की आवाजें,
सपने में देखी हैं रोटियाँ, 
और जाना है केवल अँधेरे को |

पर हताश मत हो, 
मेरे देश के बच्चे ! 
कि कुछ दिन में सब ठीक हो जाना है ;
कि अभी बाकी है आनी
अँधेरे के बाद की रौशनी ;
कि अभी देखनी है 
इंसानियत की खूबसूरती ;
कि एक दिन सब कुछ बदलना है 
तुझे और मुझे मिलकर ;
कि अभी तुझे जीना है | 

Sunday, July 22, 2012

गर्व से कहो कि हम भस्मासुर हैं


मैंने बचपन में सोचा था कि 
पढूंगा वैदिक दर्शन के बारे में, 
जानूँगा क्या होता है साररूप होना, 
क्या होता है अद्वैत दर्शन का तत्वमसि हो जाना |
सोचा था कि क्या है कृष्ण में 
जो खींचे रखता था रसखान को अपनी ओर, 
क्यों मीरा इतनी पागल थी, 
और क्यूँ लोग कबीर के इतने दीवाने होते हैं?

मैंने चाहा कि जानूँ सूफी संतों के बारे में
क्यूँ उनके चेहरे तेज़ से भरपूर होते हैं,
कैसे पाते हैं वो ईश्वर प्रेम के जरिये ?

मैंने चाहा कि जानूँ बुद्ध को,
कौन सा जादू था उनके वचनों में,
उनके चेहरे में ,
जो उन्हें देखकर लोग बन जाते थे उनके भक्त,
जो रात भर में उनके अनुयायी समंदर पार भी बन जाते थे |

ठीक उसी समय जब मैं ये सब जानने ही वाला था,
उन्होंने मुझे रोका और बताया
कि वैदिक दर्शन जानने के पहले जरूरी है
जानो देवी-देवताओं की संख्या,
जानो देश भर में कितने राम मंदिर हैं
और कितनों के बगल में मस्जिद हैं ;
और कबीर को जानना इतना इम्पोर्टेंट नहीं है
जितना महाराणा प्रताप को जानना,
परशुराम को जानना,
और यह जानना कि छत्रपति शिवाजी कितने वीर थे
और कैसे औरंगजेब को नाकों चने चबाने पड़े थे |

उन्होंने बताया कि
तुम्हारे बाबा के बाबा के मौसा को
उनके ही गाँव के एक आदमी ने मार डाला था
और उस आदमी का मजहब तुम्हारे सूफी संत के मजहब से मेल खाता है,
इसलिए वह सूफी संत ख़ूनी है |

और बुद्ध को उन्होंने विष्णु का दसवां अवतार बताया
"और चूँकि राम भी थे विष्णु के अवतार
इसलिए राम और विष्णु एक ही हैं ,
और कोई जरूरत नहीं रह जाती तब बुद्ध को जानने की"
उन्होंने कहा .

इतने सब ज्ञान के बाद उन्होंने मुझे आज्ञा दी
"जाओ मेरे धर्म-रक्षक, देशभक्त, वीर ,
और इस बेवकूफ दुनिया को भी बतलाओ
असली और नकली का भेद"

तब से मैं जहाँ भी जाता हूँ,
वहाँ फट जाता हूँ और पैदा करता हूँ
अपने ही जैसे पचास भस्मासुर
"ऐसा करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है"
ऐसा उनका कहना है.

Tuesday, July 10, 2012

एक बखत की बात

...और उस रात वह हड़बड़ाकर उठ पड़ा | पहला ख़याल उसके मन में आया "ओह! यह सपना था" | इससे कुछ सुकून मिला | उसका दिल अभी भी जोरों से धड़क रहा था | यही कारण कि उसे सामान्य होने में वक़्त लगा |

धीरे-धीरे उसे ये रात जानी-पहचानी सी मालूम होने लगी | उसे कमरे की हर चीज़ में विशेषता दिखने लगी | ये टेबल, चार्जर, कागज़, कलम .. उसे लगा कि एक लम्बा अरसा हो गया जब उसने चीज़ों को इस नज़र से देखा था | उसने कसम खायी कि अब वह अपनी ज़िन्दगी को बदलेगा | पिछले एक साल में उसकी ज़िन्दगी तिल-तिल कर ख़त्म हुई है और वह देखता आया है | सत्य वह है, जो इस समय दिख रहा है | इस तरह दुनियादारी में ज़िन्दगी मरती जाये, इससे बेहतर है मर जाना | उसे 'मेटामोर्फोसिस' का ख़याल आया, 'साम्सा' का ख़याल आया और क्रमशः 'काफ्का' का ख़याल आया |

रात बढ़ रही थी और साथ में उसकी खुमारी भी बढ़ती जा रही थी | वह भलीभांति जानता है कि ऐसी रातों को परिणति तक कैसे पहुँचाया जाता है | ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी | कलम सिरहाने ही मिल गयी | उसने डायरी उठाई, एक पन्ना लिखा बिना तारीख डाले और सो गया |

Sunday, March 11, 2012

"जो पढ़कर अच्छी लगे, वह अच्छी कविता है "

कभी-कभी हरी घास पर बैठे हुए, पेड़ों से टपकते पीले पत्तों और गाड़ियों से आती होर्न की आवाजों के बीच आप एक कबूतर को पिछले एक घंटे से देखे जा रहे होते हैं, तब जाहिर है वह कबूतर नहीं होता जिसे आप देख रहे होते हैं या वह होर्न की आवाज़ नहीं होती जिसे आप सुन रहे होते हैं. वह आपका अतीत होता है, जो आपको वीतरागी बना देता है. ऐसी स्थिति में अधिकांशतः आपको अपना बचपन याद आता है.
ये बच्चों की कवितायेँ हैं या दूसरे शब्दों में, हर आदमी के बचे-खुचे बचपन की कवितायेँ हैं, जो हाल ही में पढ़ी. ये ऐसी कवितायेँ हैं, जिन्हें समझने के लिए आलोचकों की जरूरत नहीं होती, जिन्हें पढ़ते हुए आप अपनी विचारधारा को एक किनारे रख देते हैं और जो आपकी सेहत के लिए नुकसानदेह नहीं होती.

१: "बच्चे" (इजेत साराल्जिक)

बच्चो, मैं हैमलेट नहीं
या फ्लोरेंस के ऊपर बहता बादल नहीं,
तुम मुझे जानते हो
बायीं ओर वाली पहली गली में हैं घर मेरा |

पढाई ख़त्म कर जिस दिन तुम
नोट्स और किताबों को गट्ठर जला दोगे
युद्ध-समाप्ति के बाद सीमा से तुम लौट रहे होगे
या घूमते-फिरते इजिप्ट या कहीं और से लौट रहे होगे;
प्रथम प्यार की अग्नि-ज्वाला में जले बिना तुम
उससे अधिक निखरकर उभरोगे;
प्रमोशन पा-पाकर जब तुम उद्योग-देवता
बन जाओगे
और जब, मेरी ही तरह
तुम्हारे सर के बाल सफ़ेद हो जाएँ,
बच्चो, जब जीवन का आधा वक़्त ख़त्म हो जाये,
अपनी माताओं से कहना
कि तुम दुबारा जन्म लेना चाहते हो |

२: "मुंह में दूध की बिटकिनी* डाले तामारा** क्या कहता है" (इजेत साराल्जिक)

सिर्फ इतना
बिल्ली के बच्चों को कोई परेशान न करे
भालू के बच्चों को जंगल में कोई गोली न मारे
गोले-बारूद से बार्च के पेड़ मुरझा न जाएँ
दुनिया के सारे लोग दोस्त बनकर रहें
मौत जिनको ले गयी है
फिर से लौटा दे उन्हें
भूकंप न हो
सारे विमान सुरक्षित उतरें
मेरे पापा अपनी कविता ख़त्म कर लें
सारे पापा कवि बन जाएँ|

* दूध की बोतल का निप्पल
** बच्चा

३: आदिवासी ओरांव-गीत

माँ, गाली देगी तो
जी भर कर गाली दे,
पर घर में|

गाँव के अखाड़े में
नाचते समय गाली मत देना;
वहाँ मेरी उम्र के
मेरे दोस्त होते हैं
और धांगडियाँ* भी होती हैं
सह नहीं पाऊंगा मैं |

* आदिवासी अविवाहित कन्याएँ
इस कविता को पढ़कर मैं हँसे बिना न रह सका (खिलखिलाने से कम, पर मुस्कुराने से ज्यादा)

४: बड़ों का समय (तानिकावा सुंतारो)

कोई बच्चा
हफ्ते भर में
हो जाता है
कितना चतुर चालाक
सीख लेता है पचास नए शब्द
बदल लेता है खुद को कितना |

हफ्ता बीतने तक
कोई बड़ा व्यक्ति
जैसा था, वैसा ही रहता है;
हफ्ते भर बाद भी वह
पत्रिका का पन्ना
पलटता रहता है ;
बच्चे को डांट लगाने तक में
हफ्ता भर लग जाता है बड़े को |

५: दुनिया का नक्शा (यून सेक जूंग)

घर से बनाकर लाने को मुझसे
कहा गया है दुनिया का नक्शा
कल रात भर
लगा रहा मैं
बना न पाया अब तक नक्शा |

न तुम्हारा देश, न मेरा देश
तुम्हारा राज, मेरा राज
न होकर ऐसा यदि
होती सारी दुनिया एक देश
तब होता कितना आसान
बना पाना उसका नक्शा |

Wednesday, February 29, 2012

"विल यू एक्सक्यूज़ मी प्लीज़"

दिन सूखते जाते हैं और मैं टूटता जाता हूँ. जितनी मजबूती से आपने ज़िन्दगी को बाँध रखा था ( या भ्रम पाल रखा था ), ज़िन्दगी आपसे उतनी ही दूर होती जाती है (कुटिल मुस्कान छोड़ती हुई). जितने लोगों से मिलने की कोशिश करते हैं, उतने ही अकेले होते जाते हैं. खुशियों के पौधे को एक चिड़िया काटती जाती है. उसे बचाने की कोशिश करते हैं, तो अर्थहीन में (कम से कम ऐसा आपका मानना है) अर्थ खोजता हुआ पाते हैं और ऐसा मानकर सब कुछ त्याग देते हैं.

दिस वर्ल्ड इज अ क्रुअल प्लेस. यह आपको उसी दलदल में खींचता है, जिसमें यह खुद फँसा है (मार्क्सवादियो क्षमा करना). दुनिया को आपके उदास चेहरे से उतनी ही कोफ़्त होती है, जितनी सत्ताधारियों को विद्रोहियों से. एंड यू स्टार्ट टू बिलीव, इट कैन नॉट अफर्ड अ पर्सन लाइक यू (इस्पेशली इन दिस इरा).

'सपनों का मर जाना खतरनाक होता है', पर उससे भी ज्यादा खतरनाक होता है उन्हें मरते हुए देखना. हर चीज़ से आपका भरोसा उठ चुका होता है और आगे आने वाले १० मिनट का हवाला देने में भी खुद को असमर्थ पाते हैं.

एवरीथिंग इज नॉट फाइन, सेन्योरीटा. यदि अभी भी मुश्किल हो रही है समझने में, तो मैं सीधे-सीधे अपना दर्द बयाँ कर देता हूँ कि 'ज़िन्दगी बड़ी लम्बी है और कटती नहीं है' (बहुत दिनों पहले मुझे ये बड़ी छोटी लगी थी. वेल, बोथ सिचुएसंस मेड मी सेड). इस आग के दरिया में डूबना ही डूबना है, निकलना नहीं है (कूदना तो छोड़ ही दो).

और इतनी बड़ी ज़िन्दगी को जीने के लिए गैरों के अहसान लेने ही पड़ते हैं .... 'ब्लैक' तुम्हारे बड़े अहसान हैं, जिनके तले मैं दबा जाता हूँ.

होप यू विल एक्सक्यूज़ मी. आय एम नॉट गुड एट कीपिंग प्रोमिसेस, यू नो दैट.

Sunday, March 6, 2011

अंतर्विरोध

१:
श्वेत के साथ हुआ
कृष्ण का प्रादुर्भाव ;
जीवन के साथ मौत का ,
स्वागत के साथ विदा का ;

'असत्य' का होना भी
उतना ही सत्य है,
जितना कि सत्य का होना ;

इस तरह
कुछ भी नहीं रह जाता
दुनिया का सत्य ;
शाश्वत हैं तो केवल
अंतर्विरोध ,
जिनके बूते
बनती है दुनिया
बदलती है ,
और फिर से चलती है |

२:
'साहसी बनना'/ बन के रह गया था
दुनिया का सबसे बड़ा षड़यंत्र;

बेहतर था
बतियाना साहसिक कारनामे,
सोचना - विचारना,
और उपदेश देकर बन जाना बुद्धिजीवी ;
परन्तु जैसे ही आपने चाहा साहसी बनना
वैसे ही नकार दिया गया
दुस्साहसी कहकर |

३:
अस्वीकार्य था उन्हें
अपने अस्तित्व के चारों ओर
किसी छाया का भी दिखना ;
तब कैसे स्वीकार्य होता
स्वेच्छा से अपने अस्तित्व का खात्मा ;
इस तरह
'ह्रदय-परिवर्तन' बन गया था
दुनिया का एक भद्दा मज़ाक |
वां वो गुरुरे-इज्जों-नाज़ यां यह हिजाबे-पास वज़अ
राह में हम मिलें कहाँ, बज़्म में वो बुलाये क्यों
(साभार - ग़ालिब )

Wednesday, December 8, 2010

कुछ अधार्मिक बातें

तुम्हें जब दिखानी थी रौशनी
तब-तब तुम
पहनाते रहे बेड़ियाँ
और कैद करते रहे
घुप्प अंधकारों भरे तहखानों में

तुम्हें जहाँ बसानी थी बस्तियाँ
उजाड़कर उन्हें
तुम बनाते थे महल

जब अपेक्षा थी
तुम करोगे दुनिया को संगठित
तब पथभ्रमित कर
तुम पैदा करते थे दरारें

"अत्यंत भयानक होता है
सच्चाई को जानना
जानना झूठों को
अपने भाग्य को पहचानना

भरभराकर टूट पड़ना
बचपन के महल
जीने की चाह में
पीते रहे गरल

वह नहीं है बाहर
न ही मूर्तिमानों में
निश्चित रूप से
नहीं है आसमानों में

अब और नहीं होती
तानाशाही स्वीकार
ढोया नहीं जाता
दंडों का भार

अत्यंत भयानक होता है
सच्चाई को जानना
जानना झूठों को
अपने भाग्य को पहचानना "


क्योंकि मैं नहीं देखता तुम्हें
बादलों में,
हवाओं में,
या शून्य में

क्योंकि मैं नहीं सुन सकता तुम्हें
गड़गड़ाहट में,
घंटों में,
अजानों में

क्योंकि मैं नहीं फांद सकता पर्वत
बिना क्रमशः डग धरे

क्योंकि मैं नहीं लुट सकता
अमरत्व पाने के लिए

क्योंकि अस्वीकार है मुझे 'भाग्य'
हर प्रश्न का उत्तर

क्योंकि तुम्हारा दर्शन
शुरू और ख़त्म होता है
तुम्हारे जन्मदाता के साथ

इसलिए,
हे दुनिया के महान धर्मो! (आप कहेंगे कि वाहकों)
मुझे क्षमा करना
चाहें तो आप मुझे समझ सकते हैं
माओवादी, नास्तिक
या फिर चाइनीज़ स्पाई
और पटक सकते हैं नरक में
या अगले जन्म में बना सकते हैं 'सूअर'
पर और नहीं पिया जाता
छलावे में ज़हर |

Monday, October 25, 2010

" दो भाव "

१:
कभी-कभी सोचता हूँ
बंद कर दूँ ये कविता लिखना ;

कविताएँ पढ़कर
कभी लुटाये होंगे सैनिकों ने प्राण ,
और बदली गयी होगी दुनिया
किसी ज़माने में ,
पर मैं आश्वस्त हूँ
मेरी कविता से कुछ नहीं हो सकता ;

न तो मैं मुर्दों में जान फूंक सकता हूँ ,
न मैं बदहालों को कुछ दिला सकता हूँ ,
मेरी चार पंक्तियाँ न तो सरकारें बदल सकती हैं ,
न ही ह्रदय परिवर्तन करा सकती हैं |

नहीं मुमकिन मिटा दूँ हिन्दू-मुस्लिम झगड़े,
दिला दूँ गति उन कामों को जो हैं कहीं ठहरे;
न मुझे किसी प्रेयसी के लिए लिखना है,
और न ही शायर या कवि बनना है |

शायद ही मेरी कविताओं से किसी परेशानी का हल निकले,
या मेरी स्वयं की ही मुश्किलें सुलझे

फिर मैं क्यूँ लिखूं?
कविताएँ लिखना है शायद
निश्चिंतों की जागीर |

यह सब जानते हुए भी
उन गहन अवसाद के क्षणों में
यदि दो पंक्तियाँ ठहर जाएँ जेहन में,
तो छटपटाती रहती हैं
जल बिन मछली जैसी,
कागजी समुद्र में गोते लगाने को व्याकुल;
गले में अटके कौर की तरह,
उठती रहती है एक हूक |

और जब उतार दूँ उन्हें एक कागज़ पर,
तो लगता है
उतर गया है एक बोझा
जो बरसों से कन्धों पे रखा था|

२:
मैं जब नदी देखता हूँ
तो नदी बन जाता हूँ,
और होने लगता हूँ
अजस्त्र प्रवाहित ;

मैं जब हवा देखता* हूँ
तो हवा बन जता हूँ,
और महकने लगता हूँ
सघन वन-कुंजों में ;

मैं जब पहाड़ देखता हूँ
तो पहाड़ बन जाता हूँ,
और हो जाता हूँ
धवल-गिरि की ऊँचाई पर स्थित |

आजकल मैं
कविता की तरफ भूलकर भी नहीं देखता,
कवि होकर महान बनने से अच्छा है
एक इंसान बनकर थोडा कम महान हुआ जाये ;
इसीलिए ,
दूर ही रहता हूँ
कविताओं से आजकल |
[बिम्ब कहीं पढ़ी हुई एक कविता से प्रेरित । कवि और कविता दोनों याद नहीं । ]

Monday, September 13, 2010

" समय-संगीत "

तुम्हें जाना है | इस बार मेरे आंसू नहीं झर रहे हैं, मेरी संवेदनाएं भी किसी आनंदकुंज के विहार पर गयी हैं और मैं तुमसे रात भर SMS करने के लिए झगड़ भी नहीं रहा हूँ | इस बार हमारे बीच सन्नाटा पसरा है | एक मुखर मौन |
जिन्होंने केवल हँसना और रोना सीखा है , वे निश्चय ही दुनिया के एक बड़े सुख से वंचित हैं , जहाँ हमें किसी की अपेक्षा नहीं रहती और दुनिया भी हमसे बेखबर रहती है | शायद ब्रह्म भी कुछ ऐसा ही होता होगा |

"चाय पियें?"
उत्तर की परवाह किये बिना तुम्हारे कदम स्टेशन के बाहर बने टी-स्टाल की ओर बढ़ गए और जब तक मैं शून्य से लौटूँ , तुमने मेरे हाथ में एक गरम चाय का गिलास थमा दिया है | हम अन्दर घुसने की बजाय दुकान के बाहर जमे एक पत्थर पर बैठ गए हैं |
"अच्छी है " इस बार मैंने कहा |
"ह्म्म्म"
बगल में एक पुस्तक की दुकान है | मैं जल्दी चाय ख़त्म कर उधर पहुँचता हूँ | बाहर से सारी दुकान रोजगार समाचारों और मनोहर कहानियों से भरी मालूम होती है | अन्दर स्थिति दूसरी है |
'गीतांजलि' देखकर ध्यान आया कि मैं इसे पढने की एक बार असफल कोशिश कर चुका हूँ | फिर भी मैंने दुकानदार से 'गीतांजलि' निकालने को कहा है , जिसकी जर्जर अवस्था का आकलन करने में काँच की दीवार बाधा नहीं बन रही है | तुमने मनोहर कहानियों के बीच में से ओशो की कोई पत्रिका निकाली है | मैं गीतांजलि के मुखपृष्ठ पर छपा युवा रवींद्र का चित्र लम्बे समय तक देखता रहता हूँ | तुमने शायद पन्ने पलटने शुरू कर दिए होंगे | दुकानदार ने दो स्टूल डाल दिए हैं | थोड़ी देर बाद तुमने मुझे पत्रिका में से कुछ पंक्तियाँ पढने को कहा है | उसके बाद तुमने पत्रिका यथास्थान रखकर गीतांजलि के पैसे दुकानदार को चुकाए | ६० रुपये वापस लौटता देख मैं अनुमान लगता हूँ , शायद ४० की पुस्तक है |

हम मुगलसराय जंक्शन के प्लेटफ़ॉर्म ३ के वेटिंग रूम के बाहर लगे पत्थर पर बैठ गए हैं | तुम मेरे बायीं ओर | तुमने मोबाइल में earbud ठूँस कर एक लीड मेरे कान में लगा दी है , दूसरी अपने में | फिर कुछ असुविधा होने की वजह से दोनों को बदल दिया है |
कुछ सीमित गाने हैं तुम्हारी playlist में , जो एक के बाद एक कई बार चल चुके हैं | पूछने पर तुमने बताया कि ४ Enrique के और ३ Eric clypton के हैं |
मैंने गीतांजलि पढना शुरू कर दिया है | तुमने अपने बैग से Muslim-law की कोई किताब निकाली है | ट्रेन जल्द ही आने वाली है , इसकी सूचना मिल गयी है , लेकिन हम में से किसी ने भी पूर्ववत गतिविधि में कोई परिवर्तन नहीं किया है |

इसके बाद मुझे याद है , मैं धीरे-धीरे संगीत में खो रहा हूँ ,
एक बजे की रात्रि का संगीत ;
रवींद्र की कविता का संगीत ;
Layla का संगीत ;
प्लेटफ़ॉर्म पर आती ट्रेन का संगीत ;
और अभी-अभी तुमने कुछ कहा है , जो इतने संगीत एक साथ सुनने के बावजूद भी मुझे सुनाई दिया है और वह भी इन्ही संगीतों में घुल गया है | संगीतों के इस सम्मिश्रण का मुझ पर क्या प्रभाव हो रहा है , वह वह मेरी आँखें देखकर तुम पर जो प्रभाव हो रहा है ,उससे अनुमानित किया जा सकता है | तुमने मेरी आँखों से कुछ सन्देश ग्रहण किया है और उसका जवाब मुझे तुम्हारी आँखों से मिला है और महसूस हो रहा है कि हम मौन की एक लम्बी राह पर निकल पड़े हैं | इस बीच संगीतों का सम्मिश्रण भी सुनाई देता रहा है | ट्रेन गुज़र रही है , पर गुज़र नहीं रही है ; लग रहा है हमारे एक-एक हाथ जो 'गीतांजलि' और ' मुस्लिम-लों ' से मुक्त थे , उनसे हमने धरती को पकड़कर उसकी घूर्णन गति शून्य कर दी है और समय स्थिर है | समय मापने की कोई निरपेक्ष घडी होती तो मालूम होता कि अभी ४ मिनट के 'Layla' के गाने में हमने ४ सदियाँ गुज़ार दी हैं |


"दिमाग parallely भी काम कर सकता है , मुझे आज पता लगा "
"शायद केवल एक multitasking processor हो , time को slices में बाँट देता हो "
"नहीं , मैंने एक कैनवास देखा है , जिस पर एक जगह मौन पसरा था , एक जगह "तुमि / केमन क'रे गान क'रूजे , गुणी ! " , और फिर 'Layla' और ....और "तुम्हारी आँखें "
यह मैंने एक ही कैनवास पर देखा है , टुकड़ों में नहीं "

ट्रेन गुज़र चुकी है ..
"रवींद्र स्टाइल की दाढ़ी तुम पर सूट करेगी " तुमने मेरी ओर देखते हुए कहा |
मैं निचले होंठ के नीचे उँगलियाँ फिराता हूँ |
फिर हम एक साथ मुस्कुराते हैं और लौट पड़ते हैं |
एक आदर्श फ़िल्मी कहानी की तरह वक़्त अपनी रफ़्तार पकड़ लेता है |

Monday, September 6, 2010

"शहर मर गया था " (भोपाल त्रासदी पर ग़ज़ल )

तीसरा पहर गया था ,
बाद में शहर मर गया था |

बस्तियाँ उजड़ गयी थी ,
जिधर हवा का असर गया था |

कितना भी वह बचा ले ,
पैर आदमी पर गया था |

हाथ ऊपर को उठते थे ,
जाने खुदा किधर गया था |

एक से दूसरी पीढ़ी तक ,
मुसलसल ज़हर गया था |

देश हाथ मलता रहा ,
और मुलजिम घर गया था |

जुर्म की तलाश में ,
एक अरसा गुज़र गया था |

अच्छा होता ,वह सोचता है ,
यदि उस रात मर गया था |
...
......

Tuesday, August 17, 2010

शान्ति के लिए लिखी गयी अवसाद ग्रसित कविता


जमीन से पहाड़ की चोटी
पर पहुँचते हुए
निकलती हर पसीने की बूँद के साथ ,
फूटता है ह्रदय में ,
खुशियों का एक नया निर्झर |

जमीन पर और चोटी पर
स्थित आदमी में है इतना फर्क,
कि जमीन के आदमी को
डर नहीं है गिर जाने का |

पूर्णता,पर्याप्ति और सम्पन्नता
द्योतक हैं समाप्ति के |
.
हे प्रभु ! हमें इतनी रौशनी न दे
कि बाकी दुनिया देखने से
चौंधिया जाएँ आँखें ;
न देना इतना पैसा
कि भूल जाएँ गरीबी के चनों का स्वाद ;
और हे प्रभु ! नहीं चाहिए इतनी आजादी
कि समाप्त हो जाएँ
जंजीरें तोड़ने की खुशियाँ |

इतनी बड़ी ज़िन्दगी
गुजारने के लिए जिजीविषा के साथ ,
चाहिए अवश्य
कुछ अन्धकार, कुछ गरीबी ,
थोडा पसीना और कुछ दुश्मन |

क्योंकि जहाँ खुलते हैं शान्ति के दरवाज़े ,
वहाँ से शुरू होती हैं
अशांति की गहरी खाइयाँ |

Sunday, May 23, 2010

पाँच कविताएँ

१:
कविताएँ हैं विस्मयकारी दवाएं ,
जो हमें जिंदा रखती हैं
जब हम जीने के ख्वाहिशमंद हैं ;
और जब हम मरना चाहते हैं
तब भी जिंदा रखेगी ,
सुनाकर मृत्यु के कुतूहलपूर्ण विवरण |


२:
चौबीस घंटे ,
सातों दिन ,
बारहों मास ,
और सम्पूर्ण ज़िन्दगी |

ज़िन्दगी के किसी एक पल को जीने में
उसने ली थी कविताओं की मदद,
इसीलिये वह नहीं निकल सकता सारी ज़िन्दगी भर
कविताओं के जाल से |

कविताएँ हैं एक तिलिस्मी जाल |


३:
"कविताएँ लिखना "
अनिवार्य किया जाये
इस देश के प्रत्येक ज़िम्मेदार नागरिक के लिए ;
ताकि जब किसी चोट से
टूटे कोई नाजुक दिल,
तो कविताएँ लिखकर रोकी जा सके
अनापेक्षित हृदयाघात से मौत |



४:
कवि एक,
स्थायी भाव दस,
संचारी भाव तेतीस ,

पर वह एक भाव ,
इस कदर घुस गया है
अन्तःस्थल की गहराइयों में,
कि केवल एक कविता लिखकर
नहीं मिलती उसके मर्माहत मन को संतृप्ति |
एकमात्र कविता नहीं है पर्याप्त अवरोध,
फूट पड़े सोते को रोकने के लिए |

इसीलिये वह कवि
पुनश्च और पुनश्च
उसी एक भाव पर लिखा करता है अनेकों कविताएँ |


५:
वह नहीं जानता
वे दोनों (कवि और कविता )एक दूसरे से कैसे मिले थे ,
पर जानता है जरूर,
समय के साथ उनके रिश्ते हुए हैं
प्रगाढ़ से प्रगाढ़तर |

जब-जब कविता हटाती है
उसके चहुँ ओर व्याप्त धुंध ,
और अंधियारे अंतस को बना देती है
स्फुरित एवं गुंजरित ,
तब कविता उसे लगती है
माँ जैसी पूजनीय
और आराध्य की तरह अनुकरणीय ;

फिर जब उसे
फूल में , पात में / ऋतुओं की बाट में
टीन में , कनस्तर में / मिटटी में , पत्थर में
चाँद में सूरज में / या पश्चिम में , पूरब में
यहाँ तक कि
शून्य में भी दिखती हैं कविताएँ ,
तब कविता बन जाती है उसकी प्रेमिका ,
जिससे निर्लिप्त होकर वह किया करता है प्रेम |

और फिर जब वह भावना को समेटकर
एक कविता को देता है जन्म ,
और पालता है उसे बड़े नाज़ से ,
तब कविता में उसे दिखती है बेटी
जिसे बड़े होता देख उसे हुआ करता है हर्ष |

यही क्रम चलता है अनवरत ,
और बिना जाने कविता के साथ रिश्ते ,
तिलिस्म में बँधकर कविता के
वह लिखता रहता है ;
एक के बाद एक
अनेकानेक कविताएँ |

Monday, April 12, 2010

त्रिवेणीनुमा कुछ

कैमरे छिपे हुए हैं हर शहर हर गली,
और जंगलों में आजकल रहते हैं नक्सली |

बसंती परेशान है, मिले तो कहाँ मिले ||

Thursday, February 11, 2010

उद्विग्न-व्याकुलता

मेघ पुनः संदेशा लाए,
मग में कोई नयन बिछाए |
कैसे आऊँ द्वार तुम्हारे ,
तेरे-मेरे नेह के पथ में
घिर आते हैं जग के साए |

निशा गयी और प्रात हुआ अब,स्वप्न-आकृति छूटी मन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||

धूसर दिवस आज प्रिय तुम बिन,
विप्लव की बेला में दुर्दिन |
मुखर मौन संकेत बताते ,
अश्रुपूर्ण सारी रातों भर
विरहा मन रहता है खिन ||

ज्ञान सुप्त है, क्रिया नहीं कुछ, इच्छा क्यों पूरी हो मन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||

अमराई की रुत गयी अब ,
संवेदन के भ्रम-जाल थे सब |
मोती पृथक-पृथक होना ही था
फैली माला टूट गयी जब |

भूले खग की नियति अभागी,फिर क्यों छाँव मिले मधुबन की |
एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||

Saturday, November 28, 2009

आग्रह

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गुजर चुकी हैं
कौशाम्बी और नालंदा की सभ्यताएं ,
बीत गया है
मौर्य और गुप्त वंशों का स्वर्ण-काल ,
और मिट गया है
आदिमयुगीन ताम्र-युग |

फिर घोर उद्योगवाद के दौर में
अयोध्या को पाषाण-युग में कैद कर
आपकी पथराई सोच
चाहती क्या है ?

कृपा करो अयोध्या पर !!
वह आजाद होना चाहती है
अतीत के बियाबान से |

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